इतिहास

अंग्रेजी राज्यकाल में हिन्दू समाज को धार्मिक उत्पीडन से तो शांति मिली किन्तु विघटन का जो बीज हिन्दू समाज में पैदा हो चूका था इस काल में उसे और पोषण मिला! एक एक जाती में अनेक उपजातियो में पारस्परिक एकता समाप्त हो गई और भारत में अलग अलग स्थानों पर भिन्न भिन्न नामो से फेल गई! *हमारे वंशज क्षत्रिय थे और युद्द मे स्वम के हाथो से कपडे से बनाया हुआ ध्वज हाथ मे लेकर सैना के आगे-आगे चलते थे। आम जीवन में जीवन व्यापन करने के लिए ध्वज, हलेतिया, जनेऊ, दरी (चटाई) आदी बनाने का कार्य करते थे और आज भी कर रहें है। हमारे पूर्वज सुत काट कर, वस्त्र बुनकर अपना जीवन व्यापन करते थे।

सौ वर्ष पूर्व जिन्हे शूद्र माना जाता था उन्हे अब नहीं माना जाता। यह भी तथ्य सामने आता है कि शूद्र कोई सदैव दिन हिन या पीड़ित नहीं थे, क्युकी शूद्रों ने आधी सदी तक भारत में राज किया है। कालांतर में मुगलों , पुर्तगाली, डच आदि के आक्रमणों ने और अंग्रेजी शासन में भारतीय लोगो के सामाजिक एवं आर्थिक जीवन में बहुत बदलाव आया।

शूद्र वर्ण को जातियों मे बाटना एवं अनुसूचित जाति वाली सूची तो 18वी सदी में अंग्रेजो की बनाई हुई है। भारतीय साहित्य या न्याय में कहीं कोई सूची नहीं थी। इसलिए नहीं थी कि कोई जन्मना- जाति सदा के लिए शासक-शासित या ऊंच-नीच नहीं होती थी।

जीविका के साधन, वेशभूषा में अंतर हो गया फलस्वरूप हिन्दू समाज में मतभेद हो गया, मुग़ल साम्राज्य के आखिरी दिनों में हिन्दुओ पर हुए सामूहिक अत्याचारों के कारण अनेक जातियों के कारोबार सम्बन्धी स्तिथि अस्त व्यस्त हो चुकी थी! इस जाती में भी जिन अनेक जातियों का समावेश हुआ वे अपने अपने साथ जीविका के अलग अलग साधन लेकर आई! इस काल में सामंतशाही ने भी अपना सर काफी ऊँचा कर रखा था! इस जाती की संख्या अधिक होने के कारन इन्हें व्यापर आदि दुसरे अधिक लाभ के धंधो में प्रगति करने का अवसर नहीं मिला! इस समाज की जीविका का एक मात्र प्रमुख साधन खेती करना, खेतिहर मजदूरी करना व कपडा बुनना रह गया!

           भांबी समाज में निम्नलिखित भेद है जिनमे परस्पर सम्बंधादी नहीं होते एवं एक दुसरे को प्रथक मानते है-
1.जाटा, 2.बुनकर, 3.मारू, 4.मेवाडा, 5.सालवी, 6.मेघवंशी, 7.मेघरिखा, 8.चंदौर, 9.बसिटका (बसिका), 10.कोतवाल, 11.चारणियां, 12.कोष्टी, 13.चोपदार, 14.मेघ, 15.रिखिया, 16.वशिष्ट

         शत्रिया वंश के दुसरे भाग में बताया है की इस देश पर अक्सर मुसलमानों के हमले अधिक हुए है! उस समय उनका यह कायदा था की उसकी विजय होने के बाद आम हिन्दुओ और खासकर राजपूतो अथवा युध्द करने वाली जातियों को जान से मार डालते अथवा मुसलमान बना लेते थे! उस समय उनसे बचने के तीन उपाय थे , एक या मुस्लिम धर्म अपना ले , दो दूसरी अन्य जातियों में मिलकर उन्ही का धंधा अपना कर जीवन निर्वाह करे ताकि फिर लड़ाकू न रह सके अथवा अपने प्राण दे दे! इस प्रकार समय समय पर कई जातिया तो क्षत्रियो में मिल जाती थी और कई क्षत्रियो से अलग होकर अन्य जातियों में मिल जाते थे और उनमे परस्पर भेद पड जाता था इस प्रकार क्षत्रियो को क्षत्रियो से अलग होने के लिए इतिहास में कई प्रमाण है! इन्ही कारणों से क्षत्रिय समाज का अंग टूट टूट कर दुसरे कई दल बन गए जिनके प्रमाण के लिए उनके वंश खप और गोत्र है जो वे प्राचीन काल से बताते चले आये है!

ब्रिटिश शासन काल में जातियों को हजारों जातियों मे बाट दिया गया, जिससे भारतीय समाज में आपसी तानाबाना एवं समंजस कम होता चला गया। 19वी सदी में सरकार दारा जाति सर्वे के समय सामाजिक स्तर पर आर्थिक रूप से पिछड़े हुए जातियों को शासकीय लाभ दिलाने के उदेश्य से अनुसूचित जाति की सूची में डाल दिया गया। हमारी भांबी समाज को भी सरकारी लाभ दिलाने के उड़ेश्य से अनुसूचित जाती की सूची में डाल दिया गया ताकि भांबी समाज का समुदाय सरकारी मदद से शिक्षा एवं रोजगार प्राप्त कर सक्षम बन सके। एक इसी धारणा के अनुसार हम वही क्षत्रिय वंशज के लोग है ! सरकार के राजस्व रिकार्ड मे हमारी जाति भांबी दर्ज है ।

मनुस्मृति में लिखा है की ब्रम्हा ने लोको की वृद्धी के लिए मुख से ब्राम्हण को, भुजाओ से क्षत्रिय को, उदर से वैश्य को और पेरो से शुद्र को उत्पन्न किया! यह जाती प्राचीन ऋषियों की विशुध्द संतान है इसलिए इस जाती को प्राचीन उपाधि ऋषिय है किन्तु किसी शापवश अथवा अन्य किसी कारण से शुद्रत्व को प्राप्त हो गई !

भारत की आदि निवासिनी जातियों के नाम कही तो मुखिया के नाम से और स्थान विशेष से कहिं शास्त्र चलने से कही व्यवसाय से प्रसिध हुई! आदिकाल में मनुष्य अपनी आवश्यकता की प्रत्येक वस्तुऎ स्वयं बना लेता था किन्तु जब धीरे धीरे परिवार बढने लगे तो वस्तुओ की जरूरते भी बढने लगी और अलग अलग वस्तुओ के बनाने वालो की अलग अलग जातीय बन गई!

ब्रम्हा की संतान है यह जनश्रुति दोनों की मिलती जुलती है! कपडा बुनने का कार्य करते है, साफ़ स्वछ रहते है! सूत कातकर सूत बनाने का कार्य एवं कपडा बुनने का कार्य करने से इन्हें बुनकर नाम से भी जाना जाता है! यह फिरका वात्सव में जितावंशी शत्रियो का अंश है जो कई जाटों से मिल गए और कई बुनकर हो गए!

इस समाज में श्रीरामदेवजी (रामापीर एवं रुनिजा का श्याम) का बड़ा ही महत्व है! इस पंथ प्रविष्ट होने वाले की द्रष्टि में यह समाज पूज्यपाद होती है! इस सिलसिले में भी कई लोग इस धर्म में प्रविष्ट होकर इनकी आजीविका को अपनाते हुए सम्मिलित हो गए!

वैदिक काल में वस्त्र बुनने वालो की बड़ी प्रतिस्ठा थी, उनका बड़ा सत्कार होता था और उनके बुने हुए वस्त्र को धारण कर अपने को आयुष्मान मानते थे तथा वधु को देकर उसे जरापर्यंत, आदरपूर्वक धारण करते तथा आयुष्मती होने का आशीर्वाद देते थे!

इस मंत्र में एक ऐसे विचारवान ऋषि की प्रशंसा की जो ऊन और सूत का कपडा बुनता है-
सीसेन यन्त्रं मनसा मनोशिणा:!
उनी सुत्रेण कवयो बयाती! (यजुर्वेद 17/80)

अर्थात- विचारवान विचार कर सज्जन ऊन, सूत से कपडा बुनते है!